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आदिवासी महिलाओं से बलात्कार के मामले में छूट जाते हैं 83 फीसदी लोग

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भोपाल : प्रदेश सरकार पीडि़त आदिवासियों की मुआवजा राशि मिलने की समय सीमा तय करने के बाद अब महिलाओं के खिलाफ अपराध में पुलिसिया जांच सख्त करने जा रही है। एनसीआरबी की हालिया रिपोर्ट साल 2015 – 2017 के आंकड़ें पुलिस की जांच पर सवाल खड़े कर रहे हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में आदिवासी महिलाओं से बलात्कार करने वाले 83 फीसदी अपराधी बइज्ज्त बरी हो जाते हैं। सिर्फ 17 फीसदी आरोपियों पर अपराध साबित हो पाता है। प्रदेश में आदिवासियों पर अपराध के मामले में कन्विक्शन रेट यानी सजा दर सिर्फ 17 फीसदी है।
जबकि महिलाओं के खिलाफ कुल अपराध की सजा दर 35 फीसदी है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पुलिस की तफ्तीश है जो आरोपियों को अपराधी साबित करने में नाकाम होती है। जो चार्जशीट अदालत तक पहुंचती है उसमें अपराधी को सजा दिलाने के लिए पर्याप्त और पुख्ता प्रमाण नहीं होते। प्रदेश आदिवासी महिलाओं से बलात्कार के मामले में तो अव्वल है साथ ही कमजोर सजा दर के मामले में भी उपर है।


– 2015 में महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने के मकसद से किए गए हमले के कुल 376 मामले आए जिनमें से सिर्फ 70 को सजा हुई। वहीं महिलाओं से बलात्कार के 361 मामलों में 69 लोग ही दोषी पाए गए। इसमें सजा की दर करीब 19 फीसदी रही।
– 2016 में महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए 399 हमले किए गए जिनमें से 56 आरोपी ही अपराधी साबित हो पाए। बलात्कार के 374 मामलों में महज 51 को ही सजा हो पाई। इनमें सजा दर सिर्फ 14 फीसदी रही।
– 2017 में आदिवासी महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने के इरादे से 462 हमले किए गए जिनमें से 104 को सजा मिल पाई। वहीं बलात्कार के 438 मामले दर्ज किए गए जिनमें से 74 आरोपी ही सजा पा सके। इनमें सजा की दर 17 फीसदी रही।

महिलाओं के कुल मामलों में 65 फीसदी हो जाते हैं बरी :
यदि प्रदेश की सभी वर्ग की महिलाओं के खिलाफ अपराध की सजा दर देखें तो वो आदिवासी महिलाओं के मुकाबले ज्यादा है, हालांकि उसे भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। ये सजा दर 35 प्रतिशत है यानी यहां भी 65 फीसदी अपराधी बरी हो जाते हैं।
– 2015 में 24231 मामलों में 4233 को सजा हुई। यहां सजा दर 26.5 प्रतिशत रही।
– 2016 में 26604 मामलों में 3888 पर ही दोष साबित हुआ। यहां कन्विक्शन रेट बढ़कर 27.8 प्रतिशत पर पहुंच गया।
– 2017 में 29788 मामलों में 5797 लोगों को सजा हुई। यहां दोष सिद्धि दर बढ़कर 35 फीसदी पर पहुंच गई।

बच्चों के मामलों में सजा दर यानी सीवीआर 35.5 फीसदी :
– 2015 में 12859 मामलों में 1704 को सजा हुई। यहां सीवीआर 32.8 फीसदी रही।
– 2016 में 13746 मामलों में 1642 लोगों पर दोष सिद्ध हुआ। यहां सीवीआर घटकर 30.2 प्रतिशत पर पहुंच गई।
– 2017 में बच्चों के प्रति कुल अपराध 19038 दर्ज हुए जिसमें से 2363 को ही सजा हो पाई। यहां सीवीआर बढ़कर 35.5 प्रतिशत पर पहुंच गई।

– यह बहुत गंभीर मामला है। ये आंकड़े भाजपा सरकार के समय के हैं। हम इन मामलों की समीक्षा कर रहे हैं। पुलिस की जांच में और कसावट लाई जा रही है। अब मामलों की पूरी तफ्तीश कर उन की तह में पहुंचकर पुख्ता प्रमाण इक_े किए जा रहे हैं ताकि एक भी अपराधी पुलिस गिरफ्त से छूटे न और पुलिस उनको अदालत में सजा तक पहुंचा पाए। आने वाले समय में सजा की दर में इजाफा होगा।

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